Friday, 24 October 2014
Diwali wishes to Indian Army soldiers by MAKE A DIFFERENCE group on occasion of Diwali Festival.
| Good wishes of Diwali to Gorkha Btaliyan |
| Good wishes to Sikh Regiment |
| Few moments with Real Heroes |
DIFFERENCE group on occasion of Diwali Festival.
Location: Village Sikhera,Mawana Road Near Meerut Cant.
program: Our Group "Make A Difference" wishes Happy Diwali With Sweets
and Gift to army Group Leaders in morning for all soldiers.
participaters: Gaurav Bhardwaj, Jony Kumar, Anand and Saurabh.
special participation of Retd.Subedar Mr. Bheem Singh ji.
जगमग आतिश बाजियां , रौशन है आकाश ! ....
और सितारे ढो रहे , अंधियारे की लाश !! .....
दिए जला दिल से मगर , दिल न जला तूं यार ! ...
ख़ुशी ख़ुशी दिल से मना , दीपों का त्यौहार !! ...
ज्यूँ ही हवा चराग़ के , आयी ज़रा समीप ! ....
फ़ैल गयी फिर रौशनी , जले दीप से दीप !!....
बिखरे पत्ते ताश के , भरे हुए हैं जाम ! ....
दीवाली की आड़ में , कैसे कैसे काम !! ...
घर आवे जो लक्ष्मी , सेठ तुम्हारे आज ! ...
उससे भी तुम पूछ लो , कितना दोगी ब्याज !! ...
दीवाली के रोज़ भी , आया नहीं सुहाग ! ...
अश्कों से ही रात भर ,जलते रहे चराग़ !! ....
Wednesday, 22 October 2014
'एक वो भी दिवाली थी… एक ये भी दिवाली है'... Why??
कार्तिक मास की अमावस क्यों खास होती है यह बताने की आवश्यकता ही नहीं..रोशनी के त्यौहार दिवाली से कौन अनजान होगा ?
कुछ
सालों पहले तक दिवाली की तैयारियों में जो उत्साह उमंग दिखाई दिया करता था
, क्या वह आज भी कायम है?अगर नहीं तो इसके कई कारण हो सकते हैं.इन संभावित
कारणों
को हम आप बहुत कुछ जानते भी हैं..दोहराने से
क्या लाभ..?मुख्य कारण तो मंहगाई ही है लेकिन बढ़ते आधुनिकीकरण का प्रभाव
रीती रिवाजों के साथ साथ त्योहारों पर भी पड़ रहा है.बीते कल में और आज में
बहुत परिवर्तन आ गया है.आने वाले कल में और कितना परिवर्तन आएगा या कल हम
रिवर्स में भी जा सकते हैं?
याद है ….हर साल मिट्टी के १००-१५० नए दिए लाए जाते ,पानी में उन्हें डुबा कर रखना फिर सुखाना ,रूई की बत्तियाँ बनाना,आस पड़ोस में देने के लिए दिवाली की मिठाई की थाल के लिए नए थाल पोश बनाना,रंगोली के नए डिजाईन तलाशना ,कंदीलें बनाना[अब कंदीलें गायब हैं] ,उन दिनों रेडीमेड कपड़ों का कम चलन था सो महीने दो महीने पहले ही नए कपडे ले कर दर्जी से सिलवाना.. आदि आदि…
हफ्ते भर पहले ही बच्चे हथोड़ा लिए बिंदी वाले पटाखे बजाते नज़र आते..रोकेट चलाने के लिए खाली बोतलें ढूंढ कर रखी जातीं.पटाखों में भी बहुत बदलाव आया है.घर की पुताई साल में दीवाली पर ही होती थी तो स्कूल से १-२ दिन की छुट्टी इसी बहाने से लिए ली जाती..अब डिस्टेम्पर आदि तरह तरह के आधुनिक एडवांस रंगों ने हर साल की पुताई पर कंट्रोल किया है.मिठाईयाँ नमकीन की कहें तो घर में ही सभी मिष्ठान बनते थे ..लड्डू -मट्ठी तो महीना भर के लिए बन जाते थे और मम्मी को मिठाई पर ताला भी लगाना पड़ता था [ताला लगाने की वजह मैं “मीठे की चोर” हुआ करती थी.अब केलोरी फ्री /शुगर फ्री मिठाई का फैशन है .सच कहूँ तो उन दिनों ‘डिज़ाईनर मिठाईयों/उपहारों ’ का चलन भी इतना नहीं था,घर की बनी मिठाई ली दी जाती थी.
सिर्फ दिवाली ही नहीं दिवाली के साथ शुरू हुई
त्योहारों की श्रृंखला पास पड़ोस /सम्बन्धी/मित्रों के साथ मिलकर धूम धाम से
मनाई जाती थी.
अब हम सिमट रहे हैं अपने अपने दायरों में और दिवाली एस एम् एस /ईग्रीटिंग/मिठाई /उपहारों का औपचारिक आदान प्रदान /औपचारिक दिवाली मिलन समारोह जैसा १-२ घंटे का कार्यक्रम कर अपने दायित्व की इति श्री कर लेते हैं.मैं ने जो कुछ लिखा ज़रुरी नहीं उस से सभी सहमत हों लेकिन लगता ऐसा ही है हम में से अधिकतर अपने तीज त्यौहार आज औपचारिकतावश मना रहे हैं.त्योहारों के आने का वो उत्साह /वो उमंग/ वो उल्लास जो १५-२० साल पहले हुआ करता था अब कहाँ देखने को मिलता है ?
Sunday, 19 October 2014
Friday, 17 October 2014
HAPPY DIWALI.....
FILE
|
राष्ट्र-लक्ष्मी की वंदना करते हुए
क्यों न मनाएं दीप पर्व
कुछ इस रूप में,
संस्कार की रंगोली सजे,
विश्वास के दीप जले,
आस्था की पूजा हो,
सद्भाव की सज्जा हो,
स्नेह की धानी हो,
प्रसन्नता के पटाखे,
प्रेम की फुलझड़ियां जलें,
आशाओं के अनार चलें,
ज्ञान का वंदनवार हो,
विनय से दहलीज सजे,
सौभाग्य के द्वार खुले,
उल्लास से आंगन खिले,
दान और दया के व्यंजन पकें,
मर्यादाओं की दीवारें चमकें,
प्रेरणा के चौक-मांडनें पूरें,
परंपरा का कलश धरें,
संकल्प का श्रीफल हो,
आशीर्वाद का मंत्रोच्चार,
मूल्यों का स्वस्तिक बने,
आदर्श का ओम,
सत्य का बने श्री
और प्रगति के पग,
और लाभ की जगह कर्तव्य,
विजयलक्ष्मी की स्थापना हो,
अभय गणेश की आराधना
और अजेय सरस्वती की अर्चना।
सृजन की सुंदर आरती हो,
क्यों न ऐसी शुभ क्रांति हो।
मनाएं, स्वर्णिम पर्व इस भाव रूप में,
अनुभाव रूप में।
धनतेरस की कहानी,Story of Dhanteras
भारत त्यौहारों का देश है।
विभिन्न त्यौहारों पर अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इसी प्रकार
धनतेरस पर भी यमराज की एक कथा बहुत प्रचलित है। कथा कुछ इस प्रकार है।
पुराने जमाने में एक राजा हुए थे राजा हिम। उनके यहां एक पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनाई गई। ज्योतिषियों ने कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। जब राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की बड़ी भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया।
राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया यानी सांप के आने के लिए कमरे में कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी।
इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को ‘यमदीपदान’ भी कहते हैं। भक्तजन इसी कारण धनतेरस की पूरी रात रोशनी करते हैं।
पुराने जमाने में एक राजा हुए थे राजा हिम। उनके यहां एक पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनाई गई। ज्योतिषियों ने कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। जब राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की बड़ी भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया।
राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया यानी सांप के आने के लिए कमरे में कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी।
इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को ‘यमदीपदान’ भी कहते हैं। भक्तजन इसी कारण धनतेरस की पूरी रात रोशनी करते हैं।
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मेरठ: सिर्फ़ 1857 की क्रांति नहीं, भारत की Manufacturing Capital बनने की कहानी. #Meerut #MeerutIndustries #Manufacturing #MakeInIndia #IndustrialIndia #MNC #GermanCompany #JapaneseCompany #IndustrialHub #MeerutBusiness #UPIndustry #UttarPradesh #InvestUP #BusinessIndia #FactoryLife #SportsCity #SportsIndustry #SportsGoods #Engineering #Pharma #Continental #Nipro #IndustrialDevelopment #MSME #Exports #IndianManufacturing #IndustrialGrowth #BusinessBlog #IndustryInsights #MeerutDiaries #MeerutCity #MadeInMeerut #EconomicDevelopment #StartupIndia #IndustrialCluster #BusinessStory #IndiaGrowth
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